सरकारी नौकरी !!!!

उस दिन मैं ज़रा जल्दी में था. दफ़्तर में आखिरी दिन था मेरा, मैंने तीन महीने की लम्बी छुट्टी के लिए आबेदन दिया था. मन तो था सारा पड़ा हुआ काम पूरा कर के जाऊं,पर फिर याद आया कि सारा काम पूरा करना तो जैसे बीरबल की खिचड़ी पकाने जैसा है. काम तो जैसे अनादि से अन्नंत तक चलता रहेगा. काम पूरा करने के बारे में सोचना तो जैसे इस संसार की सबसे बड़ी मूर्खता है और फिर में इतना बेबकूफ तो नहीं था कि संसार की सबसे बड़ी मूर्खता करता फिरूं.

खैर मैंने कंप्यूटर महाशय को लॉक किया और HR से मिलने चला गया, जाने से पहले कई सारी औपचारिकताओं को पूरा करना पड़ता है. HR डिपार्टमेंट बस ऊपर वाले फ्लोर पर था. लिफ्ट से निकलते ही सीधा HR डिपार्टमेंट में जाके दस्तक दी. यूँ तो वहां कोई बीस बाईस लोग काम करते थे पर न जाने क्यों मेरी नज़र उस युवती पर पड़ी, शायद वो नई नई आयी थी. दिखने में वो बेहद खूबसूरत थी , रंग गोरा चिट्टा था, काले काले खुले बाल और मिलनसार मुस्कान थी. मुझे नहीं पता मैंने उसे ही सबसे पहले क्यों देखा, खैर शायद मैं इसे संयोग की शक्ल देना चाहूंगा.

मैंने तुरंत बिना किसी बिलम्ब के उसके पास रखी कुर्सी लपक ली और अपने बारे में बताया कि आज मेरा आखिरी दिन है और मैं सारी औपचारिकताओं को पूरा करना आया हूँ. उसने मेरी बात पूरे ध्यान से सुनी और फिर अपने कंप्यूटर में कुछ चटर पटर करने लगी, शायद वो कोई फॉर्म देख रही थी. अभी कुछ दिने पहले ही हमारे यहाँ साइबर अटैक हुआ था. सूचना प्रौद्योगिकी का पूरा साजो सामान तो जैसे अपंग या यूँ कहिये कि दिव्यांग हो गया था और IT वाले हर चीज़ को बैशाखी लगा कर किसी तरह चलाने की कोशिश कर रहे थे. खैर काफी देर तक वो अपने कंप्यूटर को देखती रही और मैं उसको.

अचानक से उसने ऊपर देखा और बोली “सॉरी सर इट्स समव्हाट स्लो”.

मैंने भी अंग्रेजी में ही जबाब दिया “नो नो इट्स टोटली फाइन “. आखिर हमारे यहाँ अंग्रेजी बोलने वाले जेंटलमैन होते हैं और हिंदी बोलने वाले उच्चके तो फिर मैं हिंदी में बोलने की गलती कैसे कर सकता था. फिर हमने कुछ इधर उधर का बात करना सुरु कर दिया.

फिर उसने पूंछा “तो आप इतनी लम्बी छुट्टी लेके कहाँ जा रहे हो, शादी वादी का प्लान है क्या”.

मैंने कहा मेरा सिविल सेवा का एग्जाम है उसी की पढ़ाई के लिए जा रहा हूँ. इतना सुनते ही जैसे वो सदमे में आ गई. मानो जैसे उसे सांप सूंघ गया हो.

वो अजीब सा मुंह बनाते हुए बोली “क्या आप सरकारी नौकरी ज्वाइन करना चाहते हैं” अचानक से मानो उसका मेरे प्रति नजरिया ही बदल गया हो. अभी एक सेकंड पहले जो युवती इतने अपनेपन से मुस्कुरा कर बात कर रही थी मानो अब वो मुझे हीन भावना से देख रही हो. कुछ देर के लिए तो जैसे मुझे लगा मानो मैं किसी पिछड़ी जाति का अछूत हूँ.

मैं अपनी सफाई मैं कुछ बोल पता इससे पहले ही वो फिर से बोल पड़ी. “सर आप सिंगल हो, लाख-डेढ़ लाख हर महीने कमाते हो, अच्छी MNC में नौकरी है. सब तो ठीक है. नहीं मतलब प्रॉब्लम क्या है आपकी लाइफ में. क्यों आप सरकारी नौकरी के पीछे भाग रहे हो, पता है सरकारी नौकरी में बस अयोग्य, आलसी, अनभिज्ञ, अशिष्ट, अभद्र, अशिक्षित और उद्दंड लोग जाते हैं. जिनको काम से कोई मतलब नहीं होता, जिनका सिर्फ एक ही पेशा होता है- आराम फरमाना”

सरकारी नौकरी की ऐसी व्याख्या मैंने पहली बार सुनी थी. शायद मैं आज की इक्कीशवीं सदी में भी उसी उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी मानसिक्ता के साथ जी रहा था जिसमे सरकारी नौकरी को सबसे अहम् माना जाता है. जहाँ सरकारी नौकरी समाज में सफलता का मापदंड होती है. मानो सरकारी नौकरी तो जैसे एक प्रतिष्ठित जीवन का पासपोर्ट होती है.

खैर मैं अपनी सफाई में कुछ बोल पता इससे पहले ही वो फिर सुरु हो गई. बोली  “सर आप गवर्नमेंट जॉब में जाकर क्या करोगे. न वहां WiFi होगा, न AC, टूटी हुई लकड़ी की कुर्सी मिलेगी, सड़ी सी दो दशक पुरानी बिल्डिंग, छत ऐसी होगी जो हर बरसात में आपके कमरे को तालाब बना देगी, आपके जूनियर्स आपकी सुनेंगे नहीं,आपके सीनियर्स आपसे गाली देके बात करेंगे, हर छुट-मुठ नेता और यहाँ तक कि उसका चमचा भी आके रॉब जमाएंगे और आपको गलत काम करने पर मजबूर करेंगे, लोग आपको मक्कार और रिश्वतखोर समझेंगे, पोस्टिंग किसी ऐसी जगह मिलेगी जहाँ बिजली और पीने के पानी का भी इंतज़ाम हो जाये तो खैरियत समझाना”

अब तो जैसे पानी मेरे सिर के ऊपर से जा रहा था.

मैंने तुरंत उसे टोकते हुए बोला कि “मोहतरमा आप की बात वाजिब हो सकती है पर मैं ये सब सिर्फ अपनी सुख सुभिधाओं और पैसे के लिए नहीं कर रहा. ज़िन्दगी में कुछ चीज़ें शायद पैसे की पहुँच से परे होतीं हैं और वैसे भी मेरा यहाँ काम करना सिर्फ Company के लिया फायदेमंद है. मेरे काम से सिर्फ Company की बैलेंस शीट में नंबर्स बढ़ते हैं. इससे आम लोगों और खासकर मेरे देश का कोई ज्यादा फायदा नहीं होता”

इतना सुनते ही वो बोली “अरे सर आपने, मैंने, हम सबने सिंघम मूवी देखी है. पता है न आपको क्या होता अच्छे और ईमानदार ऑफिसर्स के साथ. लोग देश सुधारने जाते हैं और खुद की ज़िन्दगी बिगड़ जाती है”

वो और भी काफी कुछ कहना चाहती थी तब तक शायद उसका कंप्यूटर फिर से चलने लगा और वो फिर से अपने कंप्यूटर में चतर पटर करने लगी.

मैं आज भी यही सोच रहा हूँ कि क्या सरकारी नौकरी बाकई इतनी ख़राब है या फिर ये बॉलीवुड ने कुछ नए, अवास्तबिक और असंभव मापदंड पैदा कर दिए हैं. कुछ ऐसी कसौटियां जिन पर सिर्क इक्के दुक्के सरकारी मुलाज़िम ही खरे उतरते हैं !!!!

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