मोनू और मिनी !! ( पार्ट – 2)

“अरी ओ मीनिया”  काका ने फिर से आवाज़ लगाई, ” बेटा पानी ले आ “. परंतु अंदर से कोई जवाब न आया, घर में तो जैसे वीभत्स सन्नाटा था.

इधर मोनू तो जैसे मिनी से मिलने के लिए व्याकुल सा हुआ जाता था. मानो जैसे वो अपनी ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव पे हो और बिना मिनी से मिले वो यमराज के साथ जाने को तयार ही न हो. कब दो साल हो गए पता ही नहीं चला, मानो समय का पहिया रेलगाड़ी से भी तेज चल रहा हो.

खैर, दो साल भले हुए थे पर आज भी मोनू के मस्तिष्क और मन, दोनों में ही, मिनी का प्रतिबिम्ब अभी भी उतना ही तरो ताज़ा था जितना दो साल पहले. ज़नाब, प्रेम होती ही ऐसी चीज़ है, ये तो मदिरा की उस बोतल के जैसा है जो जितनी पुरानी होती जाती है उतनी ही स्वादिस्ट और सुरभित होती जाती है.

आख़िरकार मोनू से रहा न गया, “काका में अंदर जाके देख कर आता हूँ, क्या हुआ इस मिनी की बच्ची को “.

“हाँ हाँ, जा जाके देख ज़रा ” काका ने अपनी सहमति व्यक्त करते हुए कहा “और सुन अंदर से लोटा भर जल भी ले आ “.

इधर काका ने हाँ कहा, उधर मोनू के कदम स्वतः ही आँगन ही और चल पड़े. मानो मोनू के पैर एक कंप्यूटर प्रोग्राम हों और काका की “हाँ ” एक कमांड हो . इधर कमांड मिली और उधर प्रोग्राम रन करना सुरु. पगला मिनी से मिलने को इतना उत्साहित था की लोटा भर जल लाने की बात सुना ही नहीं.

मोनू देहरी लांघकर जैसे ही आँगन में गया, उसकी आँखों के सामने बचपन की सारी यादें एक एक कर के आने लगी मनो वह कोई चलचित्र देख रहा हो. कैसे इसी आँगन में वह और मिनी दोनों खूब मस्ती धमाल किया करते थे. आगे गया तो देखा की मिनी एक कुर्शी पर बैठी कोई किताब पड़ रही थी. किताब का शीर्षक कुछ अंग्रेजी में था, मोनू को समझ न आया, पर मुख पृष्ठ देख कर लगा कोई रोमांचित करने वाली किताब होगी.

मिनी ने कानों में इयरफोन लगा रखे थे, मोनू के आने की तो जैसे उसे आहट तक भी न हुई. मोनू कुछ दूर खड़ा असमंजस में पड़ गया. मोनू के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ की स्तिथि हो गई. न तो वह मिनी को उसकी किताब से दूर करना चाहता था न अपने आप से. मोनू कुछ देर तक दूर खड़ा मिनी को निहारता रहा.

मिनी तो जैसे अब बड़ी हो के मेजर हो गई थी. छरछरा सा रूप, गेहुआ रंग, हिरनी सी आँखें और उनमे माकूल काले फ्रेम का चश्मा, लाल लाल कपोल. मानो एक पल के लिए मिनी को किताब से दूर करने का विचार मोनू के मस्तिष्क से विलुप्त सा हो गया. वह तो बस वहीँ खड़ा होक मिनी को अनंत काल तक देखते रहना चाहता था.

और तभी जैसे स्वार्थपरता और ख़ुदग़र्जीपन मोनू पर हावी नो गए, उससे और रहा न गया. वह पास गया और मिनी के कंधे पर एक आहिस्ता से एक थपकी मारी. एक पल के लिए तो उस थपकी ने मिनी को डरा सा दिया पर मोनू को अपने पास खड़ा देख वह डर जैसे उल्लास और अचरज में तब्दील हो गया.

मिनी तो जैसे मूक और स्तब्ध सी रह गई !!

कहानी जारी है !!

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