मोनू और मिनी !! ( पार्ट – 1)

‘ऐ छोरा किधर जाबे  है ? ” एक जानी पहचानी आवाज़ मोनू के कानो में पड़ी. उसकी आगे बढ़ती मोटरसाइकिल सहज ही धीमी हो गई. ऐसा हुआ मानो आवाज़ का असर सीधा कानों में न होके मोटरसाइकिल के इंजन पर हुआ हो. जिस सहजता से मोनू रुका उसी सहजता से वो पीछे पलटा और देखा की पीछे एक वृद्ध आदमी उसे बुला रहा है.

अचानक से उसे एहसास हुआ की ये तो राम मनोहर काका हैं, उसके पुराने वाले घर के पास रहते हैं. मोनू ने मोटरसाइकिल साइड स्टैंड से लगायी और पास गया तो देखा काका बरगद के नीचे धुनि रमाये बैठे है. हाथ में चिलम थी जो रह रह कर धुंआ छोड़ती थी. पास में एक पुराना सा रेडियो बज रहा था. “ज़िंदगी एक सफर है सुहाना” , मोनू को लगा मानो काका राजेश खन्ना और शंकर जी दोनों के ही भक्त हैं.

“राम राम काका ” मोनू थोड़ा झिझक कर बोला.

“राम राम ” काका का उत्तर आया, आवाज़ का लहजा ऐसा था मानो वो मोनू को धमकाने की कोशिश  कर रहे हों.

“कुछ नहीं बस घर जा रहा हूँ, वो गाय के लिए सानी करनी थी न, तो बस उसी के लिए कुछ हरी घास लाने खेतों तक गया था” मोनू की आवाज़ ऐसी थी मानो वह काका से छुट्टी लेने का आबेदन कर रहा हो.

“अच्छा चल ऐसा कर मुझे भी घर तक छोड़ दे ” काका ने मोनू को जैसे हुक्म देते हुए कहा. “बूढा हो गया हूँ, अब अकेले चला नहीं जाता ”

“हाँ हाँ काका क्यों नहीं”  मोनू ने जैसे काका के हुक्म अपने सर आँखों पर ले लिया हो. वैसे उसकी आवाज़ में आज्ञाकारिता कम और आदर ज्यादा था.
मोनू ने काका को पिछली सीट पर बिठाया और चल दिया, रेडियो का गाना अभी भी चालू था.

मोनू ने एक्सेलरेटर खींचा तो जैसे मोटरसाइकिल हवा से ऐसे बातें करने लगी मानो जैसे मोनू आधुनिक महाराणा प्रताप और उसकी मोटरसाइकिल आधुनिक चेतक.

“कमबख्त धीरे चला गाड़ी ” ,काका ने मोनू की पीठ पर एक ज़ोर से तमाच मरते हुए कहा, “मुझे अभी दस साल और जीना है”

मोनू का स्पीड कम करने का कतई मन नहीं था पर अचानक से उसे एहसास हुआ की काका का घर आ गया, तो उसने गियर बदला और स्पीड कम कर दी. “लो काका कम कर दी स्पीड और लो आपका घर भी आ गया  ” मोनू ने हंस कर कहा.

“अंदर चल, घर से पानी पी कर जा “, काका ने कहा, “मिनी भी आई है शहर से उस से मिल कर जाना”

मिनी का नाम सुनते ही मानो मोनू को लगा जैसे काका ने ज़िंदगी में पहली बार कोई अच्छी बात कही हो.

दोनों बचपन से बहुत अच्छे दोस्त थे, मोनू ठहरा थोड़ा अख्खड़ गधे टाइप, उसके पढ़ने लिखने में ज्यादा मन न था. जैसे तैसे वह पास हो पाता था वह भी तब जब मिनी उसे अपनी कॉपी से नक़ल करवाती थी. दोनों का रोल नंबर हमेशा आगे पीछे ही आता था. पर मिनी को पढ़ने का बहुत शौक था वह तो हमेशा अपनी क्लास में अब्बल आती थी. इंटरमीडिएट के बाद मिनी को शहर के एक अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिल गया और मोनू अपने पिता के काम में हाथ बटाने लगा.

आज बहुत दिनों बाद दोनों का फिर से मिलना हुआ था. !!

कहानी जारी है !!

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