हरिराम – कथांश 3

कथांश 2 से आगे

हरिराम वापिस जाके फिर से खाट पर सो जाना चाहत था, उसे सोना अच्छा लगता था , आखिर सपनो की दुनिया ऐसी अजीबो गरीब है जहाँ कोई हद नहीं होती. कैसे लोग सपनो में हर वो चीज़ कर सकते हैं जो वो सोचते हैं. हरिराम और नींद का बड़ा गहरा रिश्ता था. उसे याद था किस तरह वो जवानी में खूब नींद लेता था. हर सुबह माँ उसको जगाने आती पर वो फिर से छत पर जाके सो जाता था.

हालाँकि अब तो ढलती उम्र के साथ जैसे नींद भी उसका साथ छोड़ रही थी.हरिराम के लिए सोना अब आराम करना और नाना प्रकार के सुघर सपने देखना नहीं था. अब तो नींद लेना जैसे उसका एकमात्र ऐसा हथियार था जिसके बल पे वो अपने कठोर जीवन और अपनी दरिद्रता से छुटकारा पाता था. मानों जैसे नींद में तो वो पूरी सृष्टि को चकमा दे कर कुछ पल बिताता था.

उसे याद आया कैसे वो कम से कम नीदं में तो भर पेट खाना खा सकता था, कल ही उसने नींद में दाल रोटी खाई थी. अन्यथा उसके जीवन से तो दाल जैसे विलुप्त सी हो गई थी. पिछली बार दिवाली पर जब मोनू शहर से कुछ दिनों की छुट्टी ले कर घर आया था तब वो अपने साथ कुछ दाल लाया था. पिता और पुत्र दोनों ने मिलकर कितना स्वादिस्ट भोजन बनाया था. उस दिन तो जैसे मोती ने भी उँगलियाँ चाट कर खाना खाया था.

खैर हरिराम जनता था की नींद लेना उसके लिए अपनी दुर्गम परिस्थितियों से भागने से कहीं ज्यादा है. आखिरकार दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद अपने देह को आराम देना उतना ही ज़रूरी है जितना दाल के सपने देखना.

आजकल हरिराम को अपने गांव में ही काम मिला था. मनरेगा के अंतर्गत तालाब खुदाई का काम चल रहा था.

पिछले दो तीन सालों से उत्तरोत्तर सूखा जो पड़ रहा था, गांव में पानी की बहुत कमी हो गई थी. शायद इसीलिए मुखिया जी ने इस बार तलाव बनबाने का काम शुरू किया था. बहुत इज़्ज़त करता था वो मुखिया जी की, आखिर वो अपने पैसों से गांव की भलाई का काम कर रहे हैं और उसके जैसे दिहाड़ी मज़दूरों को रोजगार भी दे रहे हैं. हर महीने जब उसको मनरेगा के पैसे मिलते तो वो मुखिया जी और उनके परिवार के लिए लाखों दुआ मांगता. खैर अभी तो उसे पिछले पांच छह महीनो से मनरेगा के पैसे नहीं मिले. उसने सुना था की आजकल मुखिया जी बिज़नेस नुकसान में चल रहा है , सोचा जब मुखिया जी वेचारे खुद इतने परेशान हैं तो उसक कुछ महीने तनख्वाह न लेना तो वाजिब है.

सच्चाई और भोलेपन का कितनी बेरहमी से शोषण करती है ये क्रूर दुनिया. हरिराम को क्या पता था की मनरेगा मुखिया जी की तिजोरी से नहीं बल्कि हुकूमते हिंदुस्तान के ख़ज़ाने से चलता है. उसे तो ये भी नहीं पता की मनरेग के जो पैसे उसके लिए सरकारी ख़ज़ाने से आये थे उनका तो कॉलोनी के निर्माण में उपयोग हो गया.

हाय रे सामन्तबाद !! . कहते हैं हर बुरी चीज़ का अंत होता है. पर शायद सामन्तबाद नाम का दैत्य तो जैसे समुन्द्र मंथन के वक्त छल से अमृत पी गया और अब समाज से अलबिदा कहने का मन ही नहीं करता … कहानी जारी है

पढ़ने के लिए कोई कोटि धन्यवाद !!!

 

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