हरिराम – कथांश 2

कथांश 1 से आगे

हरिराम ने पानी तो पिया पर उसकी प्यास न बुझी, आखिर घड़े में सिर्फ आधा गिलास पानी ही जो था. हरिराम चाँद की ओर देख के सोच रहा था की काश आज फिर ये सोम वर्षा कर दे, पानी न सही सोम से ही वो अपनी प्यास बुझा सके. फिर अचानक से उसे एहसास हुआ मानो जैसे हवा के किसी झोंके ने उसके कान में आ कर बोला हो कि पगले सोम बारिश तो देवलोक में होती यहाँ मृतुलोक में तो मनुष्य को सोम प्राप्ति के लिए झूझना और संघर्ष करना पड़ता है. यही इस धरती का निष्ठुर सत्य है.

खिड़की से बाहर झांकते हुए उसकी नज़र घर के बाहर की जर्जर सड़क पर पड़ी जो बाहर गांव तक जाती थी. सड़क न तो कच्ची थी और न ही पक्की. सड़क बनने का काम शुरू तो हुआ पर कभी खत्म न हुआ, सड़क के लिए तो मानो समय स्थिर सा हो गया था. दुर्भाग्यबस सड़क का काम खत्म होता इससे पहले ही फंड खतम हो गया और होता भी क्यों न आखिर सारा फंड तो उस कॉलोनी में जा रहा था जो मुखिया जी पास वाले महानगर में डवलप कर रहे थे.

उसने देखा तो नहीं, पर सुना था कैसे गांव वाले मुखिया जी की इंटरप्रेन्योरशिप का गुणगान करते हैं. कैसे वो महानगर की सबस भव्य और सबसे लक्ज़री कॉलोनी बना रहे हैं .ऐसी कॉलोनी जिसमे रहने के लिए दूर देश से एन.आर. आई.  लोग आएंगे बताते हैं कमरों में बिछाने के लिए पत्थर इटली से मंगाया गया है. हरिराम ने कभी मानचित्र नहीं देखा, उसे नहीं पता था की इटली कहाँ है पर इतना ज़रूर मालूम था कि इटली किसी दूर देश में है, समंदर के उस पार जहाँ लोगों के पास पीने के लिए पर्याप्त पानी है और सुन्दर से दिखने वाले पत्थरसृष्टि की महिमा देखिये गांव की एक मामूली सी सड़क के लिए स्वीकृत हुआ फंड कुछ लक्ज़री घर बनाने में लगाया जा रहा है. मानो जैसे दाने दाने पे खाने वाले का नाम लिखा होता है उसी तरह पैसे पैसे पे उसको इस्तेमाल करने वाले का नाम लिखा हो.

खैर हरिराम तो अपने आँगन के मटमैले फर्श से खुश था, जब रामवती थी तो हर हफ्ते उसे गाय के गोवर से लीपती थी और फर्श फिर से नया और आरामदायक हो जाता था. अब तो कई वर्ष हो गए जब से फर्श की लिपाई नहीं हुई. रामवती के जाने के बाद तो जैसे गांव की सारी गायों ने गोवर देना ही बंद कर दिया. …कहानी जारी है

पढ़ने के लिए कोई कोटि धन्यवाद !!!

 

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