हरीराम – कथांश 1

खटाक !!!  एक आवाज़ हुई और वो खाट से उठ कर बैठ गया.  

हरीराम हांफते हुए और पसीने से तर, ऐसे जागा जैसे किसी बुरे सपनों के कैद खाने से भाग कर आया हो . मई का महीना था तापमान ऐसे ऊपर जा रहा था मानो पारा थर्मामीटर से निकल कर एवरेस्ट पर चढ़ने की तयारी कर रहा हो. हरीराम को नहीं पता था की थर्मामीटर क्या होता है, उसने तो बस मुखिया जी को बात करते सुना था. उस दिन मुखिया जी के यहाँ कार्यक्रम में उसे भी बुलाया गया था. जाना तो नहीं चाहता था पर जाना पड़ा सोचा माई बाप हैं नहीं गया तो बुरा न मान जाएं. मुखिया जी के यहाँ जो जमावट लगी थी लोग ज्ञान विज्ञान की ऐसी ऐसी बातें कर रहे थे, हरीराम चुपचाप सुनता रहा और मन ही मन सोचता रहा की ये सब बातें उसकी सूक्ष्म समझ से कितनी बाहर हैं.

खैर अभी तो उसे जोरों की प्यास लगी थी. सहन करना अब मुशकिल हो रहा था ऐसा लग रहा था मानो गाला सूख के छुहारा हुआ जाता है. वो खाट से उठा और धीमें पाँव आँगन की और चला जहाँ घर का एकमात्र घड़ा रखा हुआ था. उसे इतनी समझ थी की अगर ज्यादा आवाज़ हुई तो मोती जगा जायेगा. आखिर मोनू और रामवती के जाने के बाद मोती ही उसका अकेला सहारा था . मोती कहने को भले ही कुत्ता था पर इंसानो से ज्यादा महसूस करता था. घड़े के पास पहुँचते ही उसने बगल में रखा गिलास उठाया और पानी लेने के लिए उसमे डाला. घड़े में पानी के स्तर इतना काम था, मानो पानी घड़े की तली को चूमना चाहता हो. ऐसा लग रहा था मानो जैसे जैसे वो अपना हाथ घड़े में डालता तैसे तैसे पानी और नीचे जाता जाता. एक पल के लिए उसे लगा जैसे घड़े में पानी खत्म हो गया है और तभी छपक सी आवाज़ आई. उधर उसके हाथ का गिलास पानी से मिला और इधर उसके प्राण निकलते निकलते रुक गए. उसने पानी से भरा गिलास बाहर निकाला और पी गया. एक पल के लिए उसे लग मानो उसने दुनिया के सबसे स्वादिष्ट आहार का पान किया हो. ऐसा जिसके आगे छप्पन भोग भी फ़ैल हों.

उसने रहत की सांस ली और आँगन के बाहर खिड़की से झाँका. पूर्णिमा की रात में चाँद ऐसी शीतल चांदनी अपने दोनों हाथों से बिखेर रहा था मानो उसने दानवीर कर्ण से प्रेरणा ली हो. फिर उसे लगा ये सब उसका भ्रम है ये तो सृष्टि की माया है दिन में सूर्य धरती को ऐसे तपाता है जैसे पिछले सौ जन्मों का बदला ले रहा हो और फिर जैसे शाम ढलते ही जैसे सूर्य को उसके कुकर्मों का बोध होता है और तब पश्चाताप के लिए वो चाँद बन के थोड़ी सी चांदनी की शीतलता भी वर्षा देता है…….. कहानी जारी रहेगी

पढ़ने के लिए कोटि कोटि धन्यबाद !!!

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