कर्ण कथा !!!

वो सूर्य पुत्र वो महावीर,
होता जिससे कुरुक्षेत्र अधीर,
वो दानवीर था कहलाता ,
हर शत्रु था जिससे थर्राता,

निस्वार्थ ,त्याग, बल, दान, वीरता,
थी समरश्रेस्ठ की ये ही विशेषता ,
कुंती के घर था जन्म लिया ,
क्षत्रिय के जैसा कर्म किया ,

पर सूत पुत्र वह कहलाया ,
दुनिया से वह धोखा खाया ,
यह दुनिया सबको ठगती है ,
खुशियों को रुखसत करती है ,

राजपुत्र न होकर भी,
जो नाम कमाया था उसने ,
होती न प्रतिभा अनुवांशिक ,
सबको बतलाया था उसने ,

भार्गवास्त्र की चाप चढाई थी,
तो अर्जुन ने मुंह की खाई थी,
माधव भी नहीं बचा पाए ,
रण छोड़ के बाहर वो आये,

था दुर्योधन का परम मित्र ,
नहीं चाहता था हो कुरुक्षेत्र ,
पर मित्र धर्म का अनुयायी ,
थी रन में वीर  गति पाई ,

क्या होता धर्म, क्या है अधर्म ,
क्या होता कर्म, क्या है कुकर्म ,
संसार में सब होता सापेक्ष्य ,
अंतर करता बस परिपेक्ष्य  !!!!

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