कॉफी, किताब और बारिश.

…और फिर बारिश आई ,
अपने साथ ठंडी सी हवा लाई ,
ये तपती गर्मी से परेशान सा था ,
बारिश के लिए बेताब सा था ,
ज़मी से उठी भीनी भीनी सी सौंधी खुसबू  ,
मेरे आँगन का पेड़ ऐसे लहलहा रहा है ,
मनो जैसे बादलों का शुक्रिया कर रहा है ,
मेरी नज़र पड़ी तो ऐसे गया थम ,
जैसे उसका निकल गया हो दम ,
आदमी नाम और नज़र से लगने लगा है डर ,
हमने उसके ज़ात वालों के किये हैं जो इतने मर्डर ,
हरी भरी पत्तियां ऐसे मुस्कुराई ,
जैसे ज़िन्दगी की सारी खुशियां हो पाई ,
मैं भी बारिश के मजे ले रहा हूँ,
किताब पढ़ते पढ़ते कॉफी पी रहा हूँ ,
ऐसे ही बारिश आती रहे ,
खुशियां यूं ही लती रहे ,
खेत भी लहलहाएं,
दिल भी मुस्कुराएं .

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