शादी और तर्क !!!

बात अभी कुछ दिनों पहले की ही है. मैंने अपनी शादी की पहली सालगिरह मनायी थी. मतलब एक साल निकल गया पता ही नहीं चला. समय तो कभी कभी जैसे रेलगाडी के पहियों से भी तेज़ भागता है. एक अभूतपूर्व उपलब्धि का एहसास हो रहा था. अपनी श्रीमतीजी के साथ बिना किसी मतभेद या तकरार के एक साल निकल देना किसी space walk से कम ना था.

मैंने आनन् फानन में अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए Facebook पर कुछ फोटो वोटो पोस्ट किए और श्रीमतीजी को रिझाने के लिए एक अच्छा सा पोस्ट भी लिख दिया. अब आज कल बिना Facebook पर पोस्ट किए, celebration तो जैसे अधूरा सा रह जाता है, तो फिर मैं ऐसा कैसे होने देता.

पोस्ट पढ़कर ऐसा लग रहा था मानों मैं दुनिया का पहला इंसान था जो शादी के एक साल बाद भी उतना ही खुश था. शादी के बाद कैसे आपके जीवन में अनेकोनेक रोड़े आने शुरू हो जाते हैं, ये बात मुझे पहली बार बाहुबली देखने के बाद पता चली थी. कैसे बाहुबली तक को शादी के बाद महल छोड़ कर दर दर की ठोकरें खानी पड़ी थीं.

ख़ैर, पोस्ट फेसबुक पर डाला तो जगजाहिर हो गया, कि भाई ये लड़का शादी के बाद भी बहुत खुश है. तमाम लोगों के मेसेजेस और कमैंट्स आए. कुछ ने प्राइवेट मैसेज कर के बधाई दी, तो कुछ ने पूछा लिया कि “भाई कैसे manage कर लेते हो, मतलब शादी के बाद भी इतना खुश. आखिर कौन सी जड़ी बूटी खाते हो”.

उन्ही में से एक मैसेज ऐसा था, जो मेरे दिलोदिमाग को छू गया. मेरे एक पुराने दोस्त ने मुझे लिखा था. बोला “भाई ये बताओ ये जो कुछ भी जादू है तुम्हारी ख़ुशी का, क्या तुम्हें लगता है थोड़ा सा मेरे ऊपर भी करवा सकता हो. मतलब मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ, बस आपने जैसा बना दो. थोड़ी training दे दो यार “. बेचारा जीवन के एक कठिन दौर से गुजर रहा था, शादी में काफी कुछ ठीक नहीं था.

मैंने उसी थोड़ी सांत्वना दी और बोला आजाओ सन्डे को घर, तुम्हें  बाबाजी से मिलबाता हूं.

बाबाजी बहुत पहुंचे हुए इंसान थे, आजकल जहां लोगों से एक बीबी नहीं सम्हलती, वहीँ बाबाजी 4-4 पत्निया और ना जाने कितनी प्रेयसी में बैलेंस बनाए रखते थे. Love-guru तो तमाम देखे थे, मगर बाबाजी पहले Marriage-guru थे शायद.

खैर,सन्डे जल्दी ही आया और हम दोनों निकल पड़े बाबाजी के ऑफिस की और. जीहाँ हम उस जगह को बाबाजी का आश्रम नहीं, ऑफिस ही बुलाते थे. ऑफिस, शहर के बीचों बीच एक पॉश इलाके मैं था, ऐसा एरिया जहां छोटे मोटे corporate तो real estate अफ़्फोर्ड ही नहीं कर पाते. बिल्डर भी शायद बाबाजी का भक्त था, कुछ ही पैसे में 99 साल की लीज मिल गयी थी बाबाजी को.

हम सीधे बाबाजी से मिलने पहुंचे, मैंने उसे बाबाजी से मिलवाया और बताया कि कैसे वह बहुत दुखी था. मैंने कहा “बाबाजी जो गुरुमंत्र आपने मुझे दिया है, वही इसे भी देने की कृपा करें. बेचारा समय और किस्मत दोनों का मारा है इस पर दया बनाए.”

बाबाजी ने उससे दो चार सवाल पूछे, मानो वह उसकी समस्या का diagnosis कर रहे थे. फिर बोले “बेटा जिस तरह तर्क, धर्म और आस्था को प्रदूषित करता है उसी तरह तर्क एक सफल वैवाहिक जीवन के लिए घातक होता है. तुम जब भी अपनी बीबी के सामने जाओ या उससे बात करो तो भूल जाओ की तुम एक मनुष्य जीव हो, तर्कसंगत और विवेकशील होना ही जिसकी ख़ास पहचान है. अपने मस्तिष्क और अपने विवेक को किसी तहखाने में बंद कर दो, बड़ा सा गोदरेज का ताला लगा दो और चाबी तो बस प्रशांत महासागर में फैंक दो.”

बाबाजी बोले “और ऐसा विशेषकर तब जरूर करो जब, तुम अपनी बीबी की शॉपिंग या उसके घर वालों के बारे में कुछ बात करो. अरे सठिया गया था वो बुढ्ढा Hegel जो उसने कहा, Real is Rational and Rational is Real. अब बताओ शादीशुदा इंसान कैसे rational हो सकता है, उसके जीवन से तो rationality को ऐसे विलुप्त हो जाना चाहिए है जैसे आजकल गौरैया हमारे घरों से विलुप्त हो रही है. शादी का और तर्क का सांप और नेवले जैसा रिश्ता होता है, अगर शादी करली, तो बस अपनी तार्किक क्षमता और अपनी बुद्धिमता को tata कह दो.”

“बस इतना करलो भक्त और कृपा बनी रहेगी ” बाबाजी उसके सर पर हाँथ रख कर बोले.

उस दिन का दिन था कि आज का दिन है, वो बंदा भी मेरी तरह बहुत खुश रहने लगा है !!!!

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Zomato, बाबा की जय !!!

सामान्यतः मेरी कहानियां किसी सच्ची घटना पर आधारित होती हैं या फिर उनसे अंशतः प्रेरित होती हैं. पर आज की कहानी कुछ अलग है, यह पूर्णतः काल्पनिक है. यह सच्चाई से उतनी ही परे है, जितना पृथ्वी हमारी आकशगंगा के केंद्र से या फिर नील नितिन मुकेश अच्छी एक्टिंग से !!

उस दिन मैं घर आने में थोड़ा लेट हो गया, बहुत काम था ऑफिस में. Month-end क्लोजिंग चल रही थी. पूरा बीस बाइस दिन का काम हफ्ते भर में निपटाना था, जनाब यही होता है जब आप आज का काम कल पर छोड़ते हैं तो. काम ने बुरी तरह थका दिया था और मुझे ज़ोरों की भूख भी लग रही थी, सोचा घर जा के खाना खाऊंगा.

खैर, मैं घर पहुंचा तो देखा की श्रीमती जी, रोज की तरह निमकी मुखिया देखने में बिजी थीं, और इतनी शिद्दत से बिज़ी थीं की उनको मेरे आने का अहसास भी न हुआ. इधर मेरे पेट में इतने चूहे दौड़ रहे थे, की मैंने सीधे रसोई घर में जाके ही सांस ली. वहां जाके देखा तो सारे बर्तन चमकते हुए रखे थे, मनो वह मुस्कुरा कर मुझे न्योता दे रहे थे की भाई कभी हमें भी यूस कर लिया करो, क्या हमें भी अपनी तरह सारी ज़िन्दगी निक्कमा ही रखोगे. बर्तनों का मुस्कुराना मानों जैसे मेरे गले न उतरा, जैसे मेरे अहम् को एक तीर सा भेद के चला गया.

“मैडम,आज खाने का क्या प्लान है”, मैंने रसोईघर से ही आवाज़ लगाई. जी हाँ हमारी श्रीमतीजी को मैडम सुनने का बहुत शौक है, बचपन से ही वह कलेक्टर बनना चाहती थीं पर शादी कर दी गई, तो अब घर पर कल्लेक्टराइन बनी रहती हैं.

मेरी आवाज़ का कोई जबाव नहीं आया शायद मैडम ने Earphones लगाए हुए थे. मैंने आवाज़ का लहजा थोड़ा सख्त किया और एक और बार ज़ोर से बोला “मैडम, आज खाने का क्या प्लान है” .

“क्या हुआ, क्यों चिल्ला रहे हो, आते ही बड़बड़ बड़बड़ शुरू हो जाते हो. कितनी बार याद दिलाऊं की ये तुम्हारा दफ्तर नहीं, मेरा घर है. तमीज़ से बात किया करो और तहज़ीब से रहा करो ” मैडम गुस्से में बोली. शायद निमकी में कुछ Climax Scene चल रहा था और मैंने disturb जो कर दिया.

मैंने तुरंत back gear डाला और इस दफ़ा प्यार भरे लहज़े में बोला “अरे यार बहुत भूख लगी है, क्या प्लान है खाने का”.

“प्लान ब्लान क्या, बाई दो महीने से आ नहीं रही. खाना बना बना के मेरी हालत ख़राब है. रोज़ की तरह आज भी, Zomato से ऑर्डर कर लो” श्रीमतीजी झल्लाते हुए बोलीं .

मुझे और मैडम, दोनों को ही खाना बनाने से बड़ी ही एलर्जी थी. किसी तांत्रिक के पास जाते तो ज़रूर कोई पूर्व जन्म का दोष निकलता खाना बनाने को लेकर. हम दोनों एक जैसे थे, खाते तो बहुत थे पर बनाने से बराबर परहेज़ रखते थे. साहब, पूरे ३६ गुण मिला कर शादी करने का शायद यही सबसे बड़ा नुक्सान था की जो मुझे अच्छा लगता वही श्रीमतीजी को और जिससे मैं कन्नी काटता उसी से हमारी श्रीमतीजी भी.

खैर, ये Zomato बड़े ही काम की चीज़ है श्रीमतीजी के लिए. शायद ये Whatsapp के बाद दूसरा सबसे ज्यादा यूज़ होने वाला App है हमारे घर में. जिस तरह एक सच्चा मुस्लमान रोज़ पांच बार नमाज़ पढ़ता है उसी तरह श्रीमतीजी भी दिन में चार बार Zomato पर जाती हैं. कुछ दिनों से तो हमारे यहाँ सुबह की चाय भी Zomato से आती है. श्रीमतीजी रात को ही आर्डर दे देती हैं चाय का, सुबह-सुबह डिलीवरी बॉय की घंटी से हमारी नींद खुलती है.

मामला तो यहाँ तक बढ़ गया है की मैं Zomato और उसके founder दीपिंदर गोयल को ही हमारा अन्नदाता मानने लगा हूँ. मैंने इन दोनों की एक-एक फोटो को सुनहरे ढांचे में मढ़वा के पूजा घर में रखने का भी पूरा मन बना लिया है और, कहने की ज़रुरत नहीं की, श्रीमतीजी इस बात पर मेरी हाँ में हाँ मिला रहीं हैं. आखिर अन्नदाता की कृपा तो सभी चाहते हैं !!!

 

चाय और मौलिक अधिकार !!!

“चल भाई चाय पी के आते हैं” एक फुसफुसाती सी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी.

आवाज़ की तीब्रता इतनी कम थी, ऐसा लग रहा था मानों कोई दूर कहीं सतयुग में बैठा मुझे यहाँ कलयुग में आवाज़ लगा रहा हो. मैंने मुड़ के देखा तो दीक्षित था. अरे साहब बड़ा ही होनहार लड़का था ये दीक्षित, पूरा कोहिनूर था कोहिनूर. बस एक ही कमी थी, आवाज़ थोड़ी कम थी. दोस्तों से भी बात करता तो ऐसा लगता था मानों बीबी के डर से फुसफुसा रहा हो.

उस दिन मैं भी थोड़ा मानसिक रूप से शिथिल महसूस कर रहा था, ये Wittgenstien और Russel की फिलोसाफी ने मेरे दिम्माग में जो लूटमार और आतंक मचाया था, उसे देख के तो चंगेज खान भी एक सज्जन सा लगता था. मैंने चाय का नाम सुनते ही, तुरंत हाँ कर दी. चाय स्पॉन्सर कौन करेगा ये ख्याल तो मेरे दिमाग में दस्तक भी न दे पाया.

चाय का नाम सुनते ही मानों मेरी सारी जटिल इन्द्रियां पुनः जाग्रत सी हो गईं. चाय जैसे एक उत्प्रेरक की तरह काम करती है, ये तो जैसे आपकी क्षमता और आपकी सामर्थ्य दोनों को एवेरेस्ट तक पहुंचा देती है. मेरा हमेशा से मानना था की एक बार कोई अच्छी अदरक, तुलसी वाली चाय पीले तो फिर ज़िन्दगी भर Redbull को हाथ न लगाए. हमारी २०० साल की ग़ुलामी आखिर व्यर्थ नहीं गई, बदले में हमें चाय जो मिली थी अंग्रेजो से.

खैर हम लाइब्रेरी से निकले और सीधे चाय कि टपरी पर जा पहुंचे. टपरी लाइब्रेरी के सीधे सामने वाली गली में हो थी. बमुश्किल दो मिनिट लगते थे लाइब्रेरी से.

बहुउद्देशीय नदी घाटी योजनाओं कि तरह,टपरी भी कई काम एक साथ करती थी और बड़ी कुशलता से करती थी . कुछ लोग टपरी पर सिर्फ चाय पीने आते थे, कुछ चाय के साथ साथ करंट अफेयर्स पर चर्चा करने आते, कुछ चाय पीने और अपने दोस्तों के साथ बकैती करने, कुछ टपरी पर चाय के साथ टोस्ट खाते और लड़कियां टांपते, तो कुछ के लिए तो टपरी जैसे एक Cupid कि तरह काम करती थी. मैं दूसरे नंबर वाले लोगों में से था जो चाय के साथ कुछ इधर उधर का चर्चा करते थे, क्या चल रहा है The Hindu में, क्या हॉट न्यूज़ है. हम भी कभी कभी बकैती करते, पर कम ही करते थे.

उस दिन The Hindu में विचार और अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता, जो एक मौलिक अधिकार है , को लेकर एक लेख छपा था. मार्केट में भी काफी न्यूज़ चल रही थी, आज इस पिक्चर पर बैन लगा तो कल उस किताब पर और जहाँ बैन न लग सका वहां मारपीट कर दी गईं. अपने आप और अपनी बात को साबित करने का सायद इससे निपुण तरीका इतिहास में आज तक न प्रयोग किया गया था. सौ प्रतिशत सफलता मिलती थी मारपीट से. अजी हाँ निर्बल और निराश्रित कि कौन सुनता, यहाँ तो सबल और सजग के ही बांदे पड़े हैं

मैं विचार और अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता के पक्ष में बोल रहा था. मैं भी आंबेडकर कि तरह पूरा संविधानबदि था और मौलिक अधिकारों को लेके तो जैसे मैं और भी सजग और सतर्क था. इनका हनन मेरे गले से न उतरता था. मैंने संविधान के Part 3 के तमाम Articles का हवाला देते हुए एक लम्बा सा तार्किक भाषण दे दिया.

जब तक मेरी बात ख़तम हुई तब तक सब , यहाँ तक कि आस पास वाले भी मुझे बड़ी विचित्र नज़रों से देख रहे थे. उनकी आखें जैसे मुझसे से पूँछ रहीं थी कि भाई कितने बार रिवाइस की लष्मीकांत. उनको लग रहा था मानों मैं खुद ही लष्मीकांत का अवतार था. सिर्फ दीक्षित ही था जो मुझे शक भरी निगाहों से देख रहा था, मानो मेरा बोलना कोई प्रोपेगंडा भर था.

उससे शायद चुप न रहा गया. बोला “हाँ भाई मैं समझता हूँ, तू क्यों इतना Article 19 के पीछे पड़ा है. शादी हो गई न तेरी, इसीलिए. अरे शादीशुदा लोगों के तो सारे मौलिक अधिकारों का हनन होता है और रोज़ रोज़ होता है. यहाँ तो ज़ालिम और पीड़ित दोनों एक ही साथ रहते हैं एक ही छत के नीचे. अब तू घर पर तो धरना दे नहीं सकता, नहीं तो तेरा हवा पानी भी बंद हो जाएगा, इसीलिए यहाँ इतना भाषण दे रहा है. Article 19 क्या तुझे तो Article 21 की जयादा फ़िक्र होनी चाहिये, आखिर जान है तो जहान है”

वहां खड़े सभी लोग ठहाके मर के हसने लगे और मैं यही सोच रहा हूँ की बात तो सही कही उस कोहिनूर के बच्चे ने !!!!

सरकारी नौकरी !!!!

उस दिन मैं ज़रा जल्दी में था. दफ़्तर में आखिरी दिन था मेरा, मैंने तीन महीने की लम्बी छुट्टी के लिए आबेदन दिया था. मन तो था सारा पड़ा हुआ काम पूरा कर के जाऊं,पर फिर याद आया कि सारा काम पूरा करना तो जैसे बीरबल की खिचड़ी पकाने जैसा है. काम तो जैसे अनादि से अन्नंत तक चलता रहेगा. काम पूरा करने के बारे में सोचना तो जैसे इस संसार की सबसे बड़ी मूर्खता है और फिर में इतना बेबकूफ तो नहीं था कि संसार की सबसे बड़ी मूर्खता करता फिरूं.

खैर मैंने कंप्यूटर महाशय को लॉक किया और HR से मिलने चला गया, जाने से पहले कई सारी औपचारिकताओं को पूरा करना पड़ता है. HR डिपार्टमेंट बस ऊपर वाले फ्लोर पर था. लिफ्ट से निकलते ही सीधा HR डिपार्टमेंट में जाके दस्तक दी. यूँ तो वहां कोई बीस बाईस लोग काम करते थे पर न जाने क्यों मेरी नज़र उस युवती पर पड़ी, शायद वो नई नई आयी थी. दिखने में वो बेहद खूबसूरत थी , रंग गोरा चिट्टा था, काले काले खुले बाल और मिलनसार मुस्कान थी. मुझे नहीं पता मैंने उसे ही सबसे पहले क्यों देखा, खैर शायद मैं इसे संयोग की शक्ल देना चाहूंगा.

मैंने तुरंत बिना किसी बिलम्ब के उसके पास रखी कुर्सी लपक ली और अपने बारे में बताया कि आज मेरा आखिरी दिन है और मैं सारी औपचारिकताओं को पूरा करना आया हूँ. उसने मेरी बात पूरे ध्यान से सुनी और फिर अपने कंप्यूटर में कुछ चटर पटर करने लगी, शायद वो कोई फॉर्म देख रही थी. अभी कुछ दिने पहले ही हमारे यहाँ साइबर अटैक हुआ था. सूचना प्रौद्योगिकी का पूरा साजो सामान तो जैसे अपंग या यूँ कहिये कि दिव्यांग हो गया था और IT वाले हर चीज़ को बैशाखी लगा कर किसी तरह चलाने की कोशिश कर रहे थे. खैर काफी देर तक वो अपने कंप्यूटर को देखती रही और मैं उसको.

अचानक से उसने ऊपर देखा और बोली “सॉरी सर इट्स समव्हाट स्लो”.

मैंने भी अंग्रेजी में ही जबाब दिया “नो नो इट्स टोटली फाइन “. आखिर हमारे यहाँ अंग्रेजी बोलने वाले जेंटलमैन होते हैं और हिंदी बोलने वाले उच्चके तो फिर मैं हिंदी में बोलने की गलती कैसे कर सकता था. फिर हमने कुछ इधर उधर का बात करना सुरु कर दिया.

फिर उसने पूंछा “तो आप इतनी लम्बी छुट्टी लेके कहाँ जा रहे हो, शादी वादी का प्लान है क्या”.

मैंने कहा मेरा सिविल सेवा का एग्जाम है उसी की पढ़ाई के लिए जा रहा हूँ. इतना सुनते ही जैसे वो सदमे में आ गई. मानो जैसे उसे सांप सूंघ गया हो.

वो अजीब सा मुंह बनाते हुए बोली “क्या आप सरकारी नौकरी ज्वाइन करना चाहते हैं” अचानक से मानो उसका मेरे प्रति नजरिया ही बदल गया हो. अभी एक सेकंड पहले जो युवती इतने अपनेपन से मुस्कुरा कर बात कर रही थी मानो अब वो मुझे हीन भावना से देख रही हो. कुछ देर के लिए तो जैसे मुझे लगा मानो मैं किसी पिछड़ी जाति का अछूत हूँ.

मैं अपनी सफाई मैं कुछ बोल पता इससे पहले ही वो फिर से बोल पड़ी. “सर आप सिंगल हो, लाख-डेढ़ लाख हर महीने कमाते हो, अच्छी MNC में नौकरी है. सब तो ठीक है. नहीं मतलब प्रॉब्लम क्या है आपकी लाइफ में. क्यों आप सरकारी नौकरी के पीछे भाग रहे हो, पता है सरकारी नौकरी में बस अयोग्य, आलसी, अनभिज्ञ, अशिष्ट, अभद्र, अशिक्षित और उद्दंड लोग जाते हैं. जिनको काम से कोई मतलब नहीं होता, जिनका सिर्फ एक ही पेशा होता है- आराम फरमाना”

सरकारी नौकरी की ऐसी व्याख्या मैंने पहली बार सुनी थी. शायद मैं आज की इक्कीशवीं सदी में भी उसी उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी मानसिक्ता के साथ जी रहा था जिसमे सरकारी नौकरी को सबसे अहम् माना जाता है. जहाँ सरकारी नौकरी समाज में सफलता का मापदंड होती है. मानो सरकारी नौकरी तो जैसे एक प्रतिष्ठित जीवन का पासपोर्ट होती है.

खैर मैं अपनी सफाई में कुछ बोल पता इससे पहले ही वो फिर सुरु हो गई. बोली  “सर आप गवर्नमेंट जॉब में जाकर क्या करोगे. न वहां WiFi होगा, न AC, टूटी हुई लकड़ी की कुर्सी मिलेगी, सड़ी सी दो दशक पुरानी बिल्डिंग, छत ऐसी होगी जो हर बरसात में आपके कमरे को तालाब बना देगी, आपके जूनियर्स आपकी सुनेंगे नहीं,आपके सीनियर्स आपसे गाली देके बात करेंगे, हर छुट-मुठ नेता और यहाँ तक कि उसका चमचा भी आके रॉब जमाएंगे और आपको गलत काम करने पर मजबूर करेंगे, लोग आपको मक्कार और रिश्वतखोर समझेंगे, पोस्टिंग किसी ऐसी जगह मिलेगी जहाँ बिजली और पीने के पानी का भी इंतज़ाम हो जाये तो खैरियत समझाना”

अब तो जैसे पानी मेरे सिर के ऊपर से जा रहा था.

मैंने तुरंत उसे टोकते हुए बोला कि “मोहतरमा आप की बात वाजिब हो सकती है पर मैं ये सब सिर्फ अपनी सुख सुभिधाओं और पैसे के लिए नहीं कर रहा. ज़िन्दगी में कुछ चीज़ें शायद पैसे की पहुँच से परे होतीं हैं और वैसे भी मेरा यहाँ काम करना सिर्फ Company के लिया फायदेमंद है. मेरे काम से सिर्फ Company की बैलेंस शीट में नंबर्स बढ़ते हैं. इससे आम लोगों और खासकर मेरे देश का कोई ज्यादा फायदा नहीं होता”

इतना सुनते ही वो बोली “अरे सर आपने, मैंने, हम सबने सिंघम मूवी देखी है. पता है न आपको क्या होता अच्छे और ईमानदार ऑफिसर्स के साथ. लोग देश सुधारने जाते हैं और खुद की ज़िन्दगी बिगड़ जाती है”

वो और भी काफी कुछ कहना चाहती थी तब तक शायद उसका कंप्यूटर फिर से चलने लगा और वो फिर से अपने कंप्यूटर में चतर पटर करने लगी.

मैं आज भी यही सोच रहा हूँ कि क्या सरकारी नौकरी बाकई इतनी ख़राब है या फिर ये बॉलीवुड ने कुछ नए, अवास्तबिक और असंभव मापदंड पैदा कर दिए हैं. कुछ ऐसी कसौटियां जिन पर सिर्क इक्के दुक्के सरकारी मुलाज़िम ही खरे उतरते हैं !!!!

So what if I may fail !!!!

Why failing is a taboo ??

There is nothing wrong in failing. Failing is fun, it keeps you humble. All the lesser mortals fail at something or else, which is okay. Only the likes of Batman and Spiderman do not fail but then they dont even have a love life.

So, I would rather be a normal human and fail than be a Batman or Spiderman, a deal fair enough !!!

 

So what if I may fail,
in my conquest of goal,
I am never ever gonna,
lie to my own soul,

I am gonna come back,
and demolish it afresh,
leaving all digressions,
that kept me in mesh,

Success will never be
a spontaneous reaction,
you have to keep heating,
to bring any combustion,

Sometimes you fail,
but you dont quit,
and all your mistakes,
you willingly admit,

You fail and you fall,
but you dont worry at all,
In the end you’re gonna win,
and you’re gonna get to grin !!!

When do you lose ??

As per convention that historians follow, although I find it and the logic in it severely flawed, battles are remembered according to the ground they were fought on. The place which saw the blood spilled all over it. Panipat to Plassy and Tarain to Haldighati  all the battles follow this.

But is it really that the battle was won or lost in that ground ??

Well NO, it was really won behind the scene in the training ground of each army. History stands live evidence to the fact that best trained armies, over the course of humanity, have won though not always but more than they lost. Be it Haider Ali`s French trained army, which gave British a good run for their money or the English army in battle of Buxar which was severely out numbered by the Mughal alliance.

Perhaps the best example that lies in the books of history, and of course movies, is Sparta. The battle of Thermopylae , a narrow coastal pass in Medditerranean, where a meagre but hard trained army of 300 Spartans fought against mighty Xerxes because they had trained themselves.
So yes, you don`t loose the fight in battle ground you loose it in your own training ground.

Train yourselves well, and like the great king Lionidas said, when their arrows descend upon you and blot your sun, you fight in shade  !!!

 

You don`t lose in battle ground,
you lose it in training ground,
you dont just lose it on D day,
you lose it in parts, every day,

The day you dont get up on time,
the day you do more pass time,
the day you babble more,
the day you dabble more,

The day you don`t practice the fight,
the day you sleep early in night,
you lose it in your comfort zone,
you lose it when you postpone,

You lose it, when you loose hope,
you lose it, when you cant cope,
you don`t lose it in battle ground,
you lose it in training ground!!!

How I wish we shd belong !!!

As the stars belong to sky,
And the eagles to the fly
As the rivers belong to seas
And the clean air to trees

As the light belong to sun,
And the butter to the bun,
Timeless, eternal and ever strong,
That is how I wish we shd belong,

Believe in me like no one else,
You be mine, my is, my was,
I will walk with your side,
Like i never never knew,
Kind, compassionate,
Gentle, tender and true !!